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मिथिला-भाषा सुन्दरकाण्ड


मिथिला-भाषा सुन्दरकाण्ड

।। अथ प्रथमोऽध्यायः ।।

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।। द्रुतविलम्वित छन्द ।।



धुतनगेऽम्बरगे परमोत्स्वे,
चकितभानुगणे जितमन्मथे ।। 1 ।।
जनकजाधिविनाशिमनोगतौ,
प्रणतिरस्तु हनूमति मारुतौ ।। 2 ।।


।। चौपाई ।।

जयजय राम नवल-घनश्याम।

सकललोक-लोचन अभिराम ।। 3 ।। 
मनमे तनिक ध्यान दृढ राखि।

मारुतनन्दन उड़ला भाखि ।। 4 ।।
शतयोजन वारिधि विस्तार।

लाँघब हम मन हर्ष अपार ।। 5 ।। 
रघुनायक-कर जनु शर मुक्त।

तथा हमहुँ जायब मुदयुक्त ।। 6 ।। 
देखथु कपिगण जाइत गगन।

शोभित जेहन प्रवहमे भगन ।। 7 ।।
 वैदेही हम देखब आज।

दोसर यहन आन की काज ।। 8 ।। 
रघुनन्दन काँ वार्ता कहब।

सत्वर घुरब अनत नहि रहब ।। 9 ।।
 नामस्मरण अन्त एक बार।

जनिकाँ भव-जलनिधि से पार ।।10।।
 प्रभुक मुद्रिका हमरा सङ्ग।

होयत न हमर मनोरथ भङ्ग ।। 11 ।।
 जायब लङ्का दनुज-समाज।

प्रभुप्रताप साधब सब काज ।। 12 ।। 



 ।। सोरठा ।। 



 उड़ि चलला हनुमान,  

ध्यान राम-पद मे सतत ।। 13 ।। 
प्रबल प्रलय पवमान,  

रौद्र-मूर्ति लङ्काभिमुख ।। 14 ।।


।। चौपाई ।।


 लङ्का जायत छथि हनुमान।

की बल की मति से के जान ।। 15 ।।
सुरसा काँ सुर सत्वर कहल।

सर्प-जननि करू सुरहित टहल ।।16।।
 बहुत दिवस धरि मानब गून।

जाउ शीघ्र घुरि आयब पून ।। 17 ।।
 रोकब बाट कहब नहि मर्म्म।

बूझब की करइत छथि कर्म्म ।। 18 ।।
 कहल कयल से नभ पथ रोकि।

चललहूँ कतय ततय देल टोकि।।19।।
 हमरा आनन सत्वर आउ।

विहित भक्ष्य अन्यत्र न जाउ ।। 20 ।।


 ।। सबैया छन्द ।।


 मारुत-सुत कहलनि शुनु माता,

राम काज कय आयब घूरि ।। 21 ।। 
सीता-विषय कहब श्रीप्रभुकाँ 

अहँक देब प्रत्याशा पूरि ।। 22 ।।
 सुरसा देवि होइ अछि अरसा,

कल जोड़ैछी छाड़ू बाट ।। 23 ।।
 अभिनत मारुति कहल न मानल,

नमस्कार कय भेलहुँ आँट ।। 24 ।।
 सुरसा कहल शून रे बाबू  

नहि छोड़ब विनु खयलैँ ।। 25 ।।
 एखनहूँ धरि जीवन-प्रत्याशा,

हमरा मुहमे आयलैँ ।। 26 ।। 
बहुत दिनासैँ हम भुखलि छी,

विनु आहारैँ मरबे ।। 27 ।। 
हाथक मुसरी बियरि मे दय

कड़े कड़े नहि करबे ।। 28 ।।


 ।। चौपाई ।। 


 मारुति कहल देबि मुह बाउ।

खाय शकी तौँ हमरा खाउ ।। 29 ।।
 योजन भरि विस्तर कर काय।

सुरसा मुह दश कोश बनाय ।। 30 ।।
 तकर द्विगुण हनुमानो कयल।

बिश योजन मुख सुरसा धयल ।।31।।

 योजन तीस वदन हनुमान।

योजन हुनक पचाश प्रमान ।। 32 ।।
 अति लघु बनि मुह बाहर जाय।

नमस्कार हँसि कहल शूनाय ।। 33 ।। 
बहरयलहूँ देवि आनन पैसि।

हम जायत छी रहब न बैसि ।। 34 ।।


 ।। दोहा ।। 


 सुरसा सन्तुष्टा कहल,

सत्वर लङ्का जाय ।। 35 ।। 
राम कार्य्य साधन करू,

 हम छी सर्पक माय ।। 36 ।।
 देव पठावल बुझल बल,

सीता देखू जाय ।। 37 ।।
 कुशल फिरब सीता-कुशल,

रघुवर देब शुनाय ।। 38 ।। 
तखन चलल हनुमान पुन,

गरुड़-गमन आकाश ।। 39 ।। 
जलधि तहाँ मैनाक सौँ,

कयलनि वचन प्रकाश ।। 40 ।।


 ।। चौपाइ ।। 


 कयल सगर-कुल बड़ उपकार।

तनिक बढ़ायोल भेलहुँ अपार ।। 41 ।।
 तनिकहि वंश राम अवतार।

हुनक दूत जाइत छथि पार ।। 42 ।।
 जलनिधि कहल जहन हित वाक।

जलसौँ उच्च भेला मैनाक ।। 43 ।।
 काञ्चन-मणि-मय श्रृङ्ग अनूप।

ततय पुरुष एक दिव्य स्वरूप।।44।।
 हे कपि हमर नाम मैनाक।

जलधि भितर डर मन मधवा क।।45।।
 मारुत-नन्दन करू विशराम।

खाउ अमृत सन फल यही ठाम।।46।।
 पथ विशराम न भोजन आज।

अछि कर्तव्य राम-प्रिय काज ।। 47 ।।
 शिखरक परश हाथ सौँ कयल। 

गगन-मार्ग पक्षी जकाँ धयल ।। 48 ।। 


 ।। दोहा ।।


 धयलक छाया-ग्राहिणी,

कयलक गमनक रोध ।। 49 ।।
हनुमानक मनमे तखन,

बाढ़ल अतिशय क्रोध ।। 50 ।।
 घोरस्वरूपा सिंहिका,

छाया धय धय खाय ।। 51 ।।
 नभचरकाँ ओ राक्षसी,

गगन गमन जे जाय ।। 52 ।।
 देखल तनिकाँ मरुतसुत,

मारल झट दय लात ।। 53 ।।
 पुनि उड़ि के चललाह से,

शान्ति भेल उत्पात ।। 54 ।। 


 ।। हरिपद ।।

 ।। पदकुल दोहा वा ।। 


 गिरि त्रिकूटपर लङ्कानगरी 

नाना तरु फल बेश ।। 55 ।।
 नाना खग मृग गण सौँ शोभित

पुष्पलतावृत देश ।। 56 ।।
 दुर्ग्ग दुर्ग्ग मे रोकत टोकत

चिन्तित मन-हनुमान ।। 57 ।। 
करब प्रवेश राति कय तहि पुर  

दिवा युक्ति नहि आन ।। 58 ।।



।। चौपाइ ।। 


 राम-चरण-सरसिज कय ध्यान।

सूक्ष्मरूप भेला हनुमान ।। 59 ।।
 पुरी-प्रवेश कयल निशि जखन।

बुझलक लङ्का नगरी तखन ।। 60 ।। 
कहलक गमहि चलल छी चोर।

हम करइत छी गञ्जन तोर ।। 61 ।।
 बुझल न अछि दशकण्ठ-प्रताप।

चललहूँ कतय अहा चुपचाप ।। 62 ।।
 चुप रह कहलैँ पढ़लक गारि।

चट दय लात चलौलक मारि ।। 63 ।।
 वाम मुष्टि हरि हनल सुतारि।

खसली अवनीमे ओ हारि ।। 64 ।। 
शोणित बान्ति करय कय बेरि।

करति कि यहन उपद्रव फेरि ।। 65 ।। 
लङ्का देवी विकला कान।

बरिया काँ नहि लागय बान ।। 66 ।।
 पुर्व्व विरञ्धि कहल छल जैह।

अनुभव होइछ भेल की सैह ।। 67 ।।


 ।। षट्पद ।। 


 नारायण अवतार राम 

त्रेता मे हयता ।। 68 ।। 
पिता-वचन सह-बन्धु 

जानकी सङ्गहि जयता ।। 69 ।।
 माया-सीता ततय मूढ़ 

दशकन्धर हरता ।। 70 ।। 
बालि मारि सुग्रीव सङ्ग 

प्रभु मैत्री करता ।। 71 ।। 
अहँ काँ तनिकर दूत कपि,

मारि मुका विकला करत ।। 72 ।।
 कहलनि विधि शुनू लङ्किनी,

तखन बुझब रावण मरत ।। 73 ।।


 ।। चौपाइ ।। 


 वनिता-उपवन अरुण अशोक।

महा भयङ्करि राक्षसि लोक ।। 74 ।।
 जनक-नन्दिनी छथि तहि ठाम।

शोभित वृक्ष शिंशपा नाम ।। 75 ।।
 कि कहब शोभा देखब जाय।

हमहूँ धन्या दर्शन पाय ।। 76 ।।
 विजय बनल अछि यश अवदात।

हमरा हानि कि सहि आघात ।। 77 ।।
 देखब राम नवल-धनश्याम।

अयोता शीघ्र रहब यहि ठाम ।। 78 ।। 
शुनि हरि हँसल चलल उत्साह।

घरहिक भेदिया लङ्का डाह ।। 79 ।। 
जखन पवन-सुत रघुपति-चार।

दुर्ग-महोदधि उतरल पार ।। 80 ।। 
दशमुख वाम अङ्ग भुज नयन।

फरकय लाग अभागक अयन ।।81।।
 भल मन्द सगुन सकल फल जान।

कालक त्रास न दशमुख मान ।। 82 ।।



इति श्री चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायणे सुन्दरकाण्डे प्रथमोऽध्यायः


।। अथ द्वितीयोऽध्यायः ।।



।। षट्पद ।।



मारुत-नन्दन तखन सूक्षम-तन, निशिमे धय कहूँ ।। 1 ।।

लङ्का कयल प्रवेश भ्रमित अतिगुप्ते भय कहूँ ।। 2 ।।

सीता तकयित ततय दशानन-मन्दिर गेला ।। 3 ।।

देखि विभव-विन्यास बहुत मन विस्मित भेला ।। 4 ।।

देखल लङ्का सकल थल, नहि प्रवेश बाँकी रहल ।। 5 ।।

देखलनि नहि सीता कतहु, स्मरण भेल लङ्किनि-कहल ।। 6 ।।



।। दोवय छन्द ।।



अरुण अशोक देवद्रुम-सोदर, तरु-तति आनत फलसौँ ।। 7 ।।

उत्तम मणि-सोपान दापिका, पूरित निर्म्मल जलसौँ ।। 8 ।।

कञ्चन महल कहल नहि जाइछ, चुम्बित जलधर-माला ।। 9 ।।

मणिस्तम्भ-शतसौं अतिशोभित, खग-मृग-परिवृत शाला ।। 10 ।।



।। चौपाइ ।।



विस्मित-मन सन मारुत-पूत । देखयित जाथि रघुत्तम-दूत ।। 11 ।।

कनक विहंगम जतय अनेक। वृक्ष शिंशपा देखल एक ।। 12 ।।

अति रमणीय निविड़ तरु-छाह । मारुत-नन्दन ततय गेलाह ।। 13 ।।

तेहि तरु ऊपर बैसला जखन । सीता काँ देखल से तखन ।। 14 ।।

भूतल देवि आबि की गेलि । राक्षस-पुरी विकल-मन भेलि ।। 15 ।।

वेणी एक मलिन अति चोर । दीना दुर्ब्बलि मृदुल शरीर ।। 16 ।।

लङ्का-विषय यहनि के आन । सीता थिकि निश्चय अनुमान ।। 17 ।।

राम राम मुख करथि उपचार । भूमि-लुठिथ मन दुःख अपार ।। 18 ।।

तहि तरु-मूल जानकी जानि । अपन भाग्य काँ उत्तम मानि ।। 19 ।।

अति कृतार्थ भेलहुँ देख आज । हम साधल रघुनायक-काज ।। 20 ।।



।। दोहा ।।



अन्तःपुर बाहरक शुनि, कल कल शब्द महान ।। 21 ।।

वृक्ष-खण्ड संलीन-तन, कर विचार हनुमान ।। 22 ।।



।। चौपाइ ।।



दशमुख वनिता-वृन्दक सङ्ग । आयल कज्जल-गिरि-वर रङ्ग ।। 23 ।।

किङ्किनि-नूपुर-शिञ्चित शुनि । दुष्ट निशाचर-आगम गूनि ।। 24 ।।

विश भुज लोचन दश गोट मुण्ड । सह सह सङ्ग राक्षसी झुण्ड ।। 25 ।।

अति विस्मित मन कह हनुमान । देखल शुनइत छलहूँ जे कान ।। 26 ।।

रहला द्रुब-दल दबकि नुकाय । अछि आगाँ कर्तव्य उपाय ।। 27 ।।

कर विचार रावण मन अपन । पुर्व्व रात्रि जे देखल सपन ।। 28 ।।

राम पठाओल वानर दूत । कामरूप बल बुद्धि बहुत ।। 29 ।।

टक टक ताकय तरु पर बैशि । बुझलक घाट बाट पुर पैशि ।। 30 ।।

कयल बहुत हम रामक दोष । एखनहु धरि हुनका नहि रोष ।। 31 ।।

कहिया मरण राम-कर हयत । माया-पाप-काय छुटि जयत ।। 32 ।।

एखनहु धरि नहि आबथि राम । कहिया होयत दिव्य संग्राम ।। 33 ।।

मनमे ज्ञान ऊपर अभिमान । चकमक भितर आगि समान ।। 34 ।।

वचन-बाण तेहन अनुसरब । सीता-मन अति कलुपति करब ।। 35 ।।

स्वप्न सत्य तौँ कपि देख लेत । रामचन्द्र काँ सभ कहि देत ।। 36 ।।

जौँ कपि होयता कहता जाय । लयोता सानुज राम बजाय ।। 37 ।।

ई मन गुनिकेँ सीता निकट । पहुँचल दशमुख दुर्म्म्द विकट ।। 38 ।।

सीता-दशा कहल नहि जाय । आत्ममध्य जनु रहलि समाय ।। 39 ।।



।। दोहा ।।



रावण सीता काँ कहल, सुमुखि सत्य वृतान्त ।। 40 ।।

राम न अयोता काज किछु, मनमे करू सिद्धान्त ।। 41 ।।



।। चौपाइ ।।



वैदेही परिहरु सन्ताप । उचित कयल नहि अहाँकाँ बाप ।। 42 ।।

रामक हाथ देल को जानि । कानन-वास अकारण हानि ।। 43 ।।

हेम-हरिण देखयति भेल लोभ । लङ्का देखि त्यागु मन क्षोभ ।। 44 ।।

शिव शिव आब कि रामक आश । लङ्का छोट हाथ उनचास ।। 45 ।।

जौँ नहि निर्गुण रहितथि राम । तौँ बसतथि नृप-दशरथ-धाम ।। 46 ।।

राम बसथि वनचर-गण संग । हमहूँ शुनल छल कथा-प्रसंग ।। 47 ।।

बहुत तकायोल लोक पठाय । नहि भेटला रहलाह नुकाय ।। 48 ।।

जौँ हुनका अहँ में किछु प्रीति । अबितथि लय जइतथि रण जीति ।। 49 ।।

पामर रामक त्यागु आश । विद्यमान लङ्केश्वर दास ।। 50 ।।

हरि आनल अहाँकाँ कत दूरि । एको बेरि की तकलनि घुरि ।। 51 ।।

बड़ कपटी छथि ज्ञान घमण्ड । दैवो देलथिन समुचित दण्ड ।। 52 ।।

सकल सुरासुर-नारि समाज । सभक स्वामिनी होयब आज ।। 53 ।।

सीता मन जनु करू किछु छोट । भाग्य अहाँक भेल बड़ गोट ।। 54 ।।

तृण-अन्तरित अधोमुखि रुष्ट । रवां-वचनक उत्तर पुष्ट ।। 55 ।।

जे शिर शिवकाँ अर्पण कयल । प्रबल पाप चरणो तत धयल ।। 56 ।।

धिक धिक रावण तोहर ज्ञान । काल-निकट अनहित हित मान ।। 57 ।।

जनिक त्रास बनि भिक्षुक रूप । हरि हरि हरि लयला की चूप ।। 58 ।।

कुक्कुर जनु मख-घृत लय जाय । मरबह खल पाछाँ पछताय ।। 59 ।।

मानुष मनाह श्रीरघुवीर । परिचय मन तन लगलय तीर ।। 60 ।।

अयोता सानुज प्रभु रघुनाथ । विचलत गर्व्व तोर दश-माथ ।। 61 ।।

बाणक तेज समुद्र सुखाय । सायक-सेतु उदधि बन्धबाय ।। 62 ।।

अयोता निश्चय होयत मारि । निश्चय तोहर रणमे हारि ।। 63 ।।

मरबह पुत्र-विकट-बल-सहित । आयल निकट तेहन दिन अहित ।। 64 ।।



।। दोहा ।।



सीता-वचन कठोर शुनि, रावण लय तरुआरि ।। 65 ।।

यहन कथा हमरा कहति, सद्यः हम देब मारि ।। 66 ।।



।। चौपाइ ।।



मन्दोदरी कहल शुनू नाथ । अबला बध की अपनैँ हाथ ।। 67 ।।

विदित वीर अपनैँ ई नारि । अपयश पाप देब जौँ मारि ।। 68 ।।

अबला ऊपर एतटा रोष । कड़रिक तरु पर शितुआ चोष ।। 69 ।।

कृपणा मलिना दुर्ब्ब्ल देह । हिनका जीबहु मे सन्देह ।। 70 ।।

अन्न पानि कयलनि अछि त्याग । नहि करती पर-जन अनुराग ।। 71 ।।

अहँकाँ कोन कमी प्राणेश । जीतल भुज-बल सकलो देश ।। 72 ।।

सुर गन्धर्व्व सकल जन नाग । कन्या लयलैँ मनता भाग ।। 73 ।।

कन्या-जन मद-घूर्णित-नयन । अपनहि सुखसौँ अउती शयन ।। 74 ।।



  ।। दोहा ।।



रावण राक्षसि सौँ कहल, उत्कट त्रास देखाय ।। 75 ।।

अनुकूला सीता करह, जे बल बुद्धि उपाय ।। 76 ।।

दुइ मासमे करति ई, जौं हमरा सौँ प्रेम ।। 77 ।।

सकल राज्य-रानी हयति, हिनका सभ सुख क्षेम ।। 78 ।।

बहुत बुझौलय नहि बुझथि, बीति जाय दुइ मास ।। 79 ।।

हम आज्ञा दय डेल अछि, हिनकर करब विनाश ।। 80 ।।



।। चौपाइ ।।



अन्तःपुर गेला दश-भाल । वनिता-परिवृत गर्व्व विशाल ।। 81 ।।

विकटादिक सीता तट जाय । भयभीता कर स्वाङ्ग बनाय ।। 82 ।।

व्यर्थ तोर तन यौवन आस । भेल न दशमुख सौँ सहवास ।। 83 ।।

केओ कह हिनक अङ्ग सभ काट । केओ कह जीह सँ शोणित चाट ।। 84 ।।

अपने हठ अपने सुख खाय । होयत की पाछाँ पछताय ।। 85 ।।

केओ तरुआरी तेज लय हाथ । काटि लिअ हम हिनकर माथ ।। 86 ।।

केओ दौड़य बड़ गोटमुह बाय । की विलम्ब हम जाइछि खाय ।। 87 ।।

त्रिजटा कहल करह अन्याय । सीता नहि जानह असहाय ।। 88 ।।

हिनकर निकट भ्रमहूँ जनु जाह । अपने अपने तन बरु खाह ।। 89 ।।

यहि खन हम देखल अछि सपन । होयत सत्य बुझल मन अपन ।। 90 ।।



 ।। रूपमाला ।।



चढ़ल ऐराबतक ऊपर, राम लक्ष्मण सङ्ग ।। 91 ।।

दग्ध लङ्कापुरी भय गेल, समर रावण भङ्ग ।। 92 ।।

राम-सेवा कर विभीषण राज्य लङ्का पाय ।। 93 ।।

जानकी ई राम अङ्क-स्थिता भेली जाय ।। 94 ।।



।। चौपाइ ।।



दशमुख नग्न सकल परिवार । तेल लगओलय भरल विकार ।। 95 ।।

गोबर डाबर मध्य नहाथि । खर पर चढ़ल याम्य दिश जाथि ।। 96 ।।

रावण मरता सहित समाज । प्राप्त विभीषण काँ भेल राज ।। 97 ।।

  राम जानकी मिलि घर जायत । दुखमय लङ्का सत्वर हयत ।। 98 ।।

करत अनर्थ अखण्डित नोर । धन्य धन्य सीता हिय तोर ।। 99 ।।

करू करू धैरज कहब कि आन । मुठिएक धुरि न चानमलान ।। 100 ।।



।। गीत ।।



त्रिजटा कहल शुनू जानकी नवीन कथा ।। 101 ।।

वानर-विशेष वर वाटिका उजारलक ।। 102 ।।

रक्षक प्रबल रण-दक्ष लक्ष लक्ष खेत ।। 103 ।।

मुइल मूर्छित कतो रावण पुकारलक ।। 104 ।।

“चन्द्र” भन यहन न देखलशुनल छल ।। 105 ।।

अक्षयकुमार काँ पटकि झट मारलक ।। 106 ।।

कतहूँ न हारलक वीरता प्रचारलक ।। 107 ।।

रावण-पालित हाय लङ्कापुर जारलक ।। 108 ।।



।। सवैया छन्दः ।।



स्वप्न कथा राक्षसि-गण शुनिकेँ ।। 109 ।।

त्यागि उपद्रव गेलि डराय ।। 110 ।।

मद-मातलि छलि जागलि थाकलि ।। 111 ।।

निन्द-विवश भेलि जहँ तहँ जाय ! ।। 112 ।।

सीता तखन विकलि मन-भीता ।। 113 ।।

दुःख-मूर्छिता रहति-उपाय ।। 114 ।।

कनयित कलपि कहथि कि करू विधि ।। 115 ।।

प्रातहि राक्षसि जाइति खाय ।। 116 ।।



।। गीत काफी ।।



सपन हम देखल अचिन्तित राति ।। 117 ।।

विद्रुम-रक्त-वदन तेजोमय, अद्भुत वानर जाति ।। 118 ।।

प्रभु-प्रेषित पथोनिधि सन्तरि, लङ्का-परिचय पाबि ।। 119 ।।

हम विधिहता शुनल शुभ वार्ता, इष्ट अनिष्ट कि भावि ।। 120 ।।

जे दिन लङ्का प्रलय होइछ नहि, से दिन पापिक भाग ।। 121 ।।

इ अन्याय घोर लङ्कामे, पानिसौँ आगि न लाग ।। 122 ।।

सुरपति-सुतक परभाव-दायक, कोशल कौशल भूप ।। 123 ।।

से शर से कर से रघुवर वर, कत बैसल छथि चूप ।। 124 ।।



।। गीत ।।



से दिन कोना होयत मनोरथ पूर ।। 125 ।।

रघुनन्दन-बल प्रलय पवन सम, अधम निशाचर तूर ।। 126 ।।

देवर-तीर जेहन प्रलयानल, रावणगण वन झूर ।। 127 ।।

के हम थिकहुँ ककर हम कामिनि, परिचय पओता कूर ।। 128 ।।

सकल तमीचर तामस तम सम, श्रीरघुनन्दन सूर ।। 129 ।।

हमर यहन गति दैव देखै छथि, नहि उपाय किछु फूर ।। 130 ।।

तीरक तेज समुद्र सुखायत, जल थल उड़त धूर ।। 131 ।।

कोटि शनैश्चर सहित सङ्कटा, लङ्का  घर घर घूर ।। 132 ।।



।। गीत ।।



केहन विधि लिखल वपत्ति-तति भाल ।। 133 ।।

कुल पवित्र कुल-कामिनी हमरहि, कठिन विपत्ति जंजाल ।। 134 ।।

रघुनन्दन पति देवर लक्ष्मण, जनि डर काँपय काल ।। 135 ।।

चोर दशानन त्रास देखाबय, अनुचित कह वाचाल ।। 136 ।।

दनुज-बधू कह मारब काटब, चाटब शोणित लाल ।। 137 ।।

यहि अवसर जौँ ओ प्रभु आबथि, देखथि सबटा हाल ।। 138 ।।

काल-दूत जानि हेम-हरिण छल,  छल न बुझल ततकाल ।। 139 ।।

कालहि सिंह-घरणि तट निर्भय, गरवित सरब श्रृगाल  ।। 140 ।।



।। गीत ।।



हमर विधि प्राण अपन भेल भार ।। 141 ।।

की सुख भुजि छथि ओ ई देहमे, कतहु कि नहि आधार ।। 142 ।।

जौँ आबथि रघुनन्दन सानुज, लीला सागर पार ।। 143 ।।

गृद्धझुण्ड दशमुण्ड-मुण्ड पर कर खर नखर प्रहार ।। 144 ।।

ककरा कहब केओ नहि मानुष, नहि कारुणिक चिन्हार ।। 145 ।।

रक्षा करथि अरक्षित जनकाँ, केवल धर्म्म उदार ।। 146 ।।

कठिन विषय विष तिष नहि भेटय, खड़ग न लग तिष-धार ।। 147 ।।

शिव शिव जीव-घात वर मानल, धिक जीवन संसार ।। 148 ।।

रामचन्द्र-चन्द्रिका थिकहूँ हम, सपन न मन व्यभिचार ।। 149 ।।

विधि बुद्धि विरहिणि  व्याकुलि एकसरि चित चिन्ता विस्तार ।। 150 ।।



।। सवैया मुदिरा ।।



हा रघुनाथ अनाथ जकाँ, दशकण्ठ-पुरी  हम आइलि छी ।। 151 ।।

सिंहक त्रास महावनमे हरिणीक समान डराइलि छी ।। 152 ।।

चन्द्र-चकोरि अहैँक सदा, हम शोक-समुद्र समाइलि छी ।। 153 ।।

देवर-दोष कहू हम की, अपना अपराध सँ काइलि छी ।। 154 ।।



।। दोहा ।।



जनक जनक जननि अवनि, रघुनन्दन प्राणेश ।। 155 ।।

देवर लक्ष्मण हमर छथि, नैहर मिथिला देश ।। 156 ।।





।। इति श्री चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायणे सुन्दरकाण्डे द्वितीयोऽध्यायः ।।


।। अथ तृतीयोऽध्यायः ।।

।। चौपाई ।।



सीता शुनथि शुनय नहि आन । शञ्च शञ्च कह तहँ हनुमान ।। 1 ।।

राजा दशरथ काँ सुत चारि । जेठ राम काँ सीता नारि ।। 2 ।।

शिव-धनु तोड़ल मिथिला जाय । जनक देल कन्या से न्याय ।। 3 ।।

परशुराम अयला कय कोप । तनिकर भय गेल गर्व्वक लोप ।। 4 ।।

भूमि-भार-संहारक काज । विघ्न कयल बड़ देव-समाज ।। 5 ।।

बारह वर्ष राम वनवास । केकयि परवश कयल प्रयास ।। 6 ।।

हरल शारदा केकयि-क्षान । ककरो कहल कि रानी मान ।। 7 ।।

वर न्यासित दसरथ सौँ लेल। दशरथ-प्राण रहित भय गेल ।। 8 ।।

लक्ष्मण सीता संगैँ राम । पंचवटी मे कैलनि धाम ।। 9 ।।

भिक्षुक बनि रावण सञ्चरल । शुन्याश्रम सौँ सीता हरल ।। 10 ।।

दश-भालक संग लड़ल जटाउ । दृष्ट कथा हम कते शुनाउ ।। 11 ।।

कानन-कथा सकल से कहल । विरही विकल राम दुख सहल ।। 12 ।।

किष्कन्धा मे यहन चरित्र । बालि घालि सुग्रीव सुमित्र ।। 13 ।।

सुग्रीवक हम मन्त्रि प्रधान । नाम हमर कह जन हनुमान ।। 14 ।।

वानर दूत फिरय देश । सीतान्वेषण मुख्य निदेश ।। 15 ।।

तहि मे हमहूँ पयोनिधि फानि । अयलहूँ लङ्का जानकि जानि ।। 16 ।।

वृद्ध गृद्ध कहलनि सम्पति । घुरि फिरि देखल लङ्का राति ।। 17 ।।

दबकल दबकल यहि तरु कात । देखल शुनल गञ्जन उतपात ।। 18 ।।

हम कृतार्थ भेलहुँ अछि आज । हमहि कयल रघुनन्दन-काज ।। 19 ।।

जनक-नन्दिनी देखल आँखि । अयलहूँ सङ्गी पारहि राखि ।। 20 ।।



।। षट्पद छन्द।।



नहि अछि आज्ञा तेहन, जेहन हम कौतुक करितहूँ ।। 21 ।।

लङ्कापुरी उखाड़ि प्रभुक पद लग लय धरितहूँ ।। 22 ।।

दशमुख सौँ कय बेरि अपन दुहु पयर धरबितहूँ ।। 23 ।।

लाँगड़ि मे लपटाय बाँधि सभ लोक फिरबितहूँ ।। 24 ।।

जननि थोड़े दिन विपत्ति अछि, सकुल सदल रावण मरत ।। 25 ।।

गृद्ध काकगण मगन मन, लङ्कापुर डेरा करत ।। 26 ।।



।। चौपाई ।।



धयलैँ छली अशोकक डारि । शुनल सकल मन रहलि  विचारि ।। 27 ।।

कहयित के अछि कथा चिन्हार । देखतहुँ लोचन बह जल षार ।। 28 ।।

दुःख अपार निन्द नहि आब । गगन वचन हित हमर शुनाव ।। 29 ।।

मरइत राखि लेल जे प्राण । वचन शुनाओल अमृत समान ।। 30 ।।

दया करथु से दर्शन देथु । सुकृति-समाज सहज यश लेथु ।। 31 ।।

शञ्च शञ्च से कयल प्रणाम । ह्रदय राखि रघुनन्दन राम ।। 32 ।।

सीता-वचन शुनल हनुमान । प्रकट भेल कलविङ्क-प्रणाम ।। 33 ।।

पीत वर्ण मुख अतिशय लाल । बध्दाञ्जलि मन हर्ष विशाल ।। 34 ।।

आगाँ आबि प्रणत कपि रहल । देखइत सीता मनमे कहल ।। 35 ।।

वानर-रूप धयल दशकण्ठ । हमरा मोहय कारण चण्ठ ।। 36 ।।

रहलि अधोमुखि विकलि  अवाक । रावण-भ्रम मे कतहूँ न ताक ।। 37 ।।

मानिय हमरा जननि न आन । हम रघुपतिक दास हनुमान ।। 38 ।।

पवनक तनय विनययुक्त जानि । सज्जन थिकथि ह्रदय अनुमानि ।। 39 ।।



।। दोहा ।।



शाखामृग निश्चय अहाँ, हमरा मन विश्वास ।। 40 ।।

नर-वानर-सँघटन- विधि, कारण करू प्रकाश ।। 41 ।।



।। चौपाई ।।



दूर-स्थित कहलनि हनुमान । जननि कहब हम वचन प्रमाण ।। 42 ।।

लक्ष्मण-सहित राम घनश्याम । धनुर्बाण धर छवि अभिराम ।। 43 ।।

ऋष्यमूक लग अयला जखन । दृष्टि पड़ल सुग्रीवक तखन ।। 44 ।।

हमरा ततय पठौलनि विकल । इष्ट अनिष्ट बुझू विधि सकल ।। 45 ।।

इष्ट मानि मन दुनु भाय । लय गेलहुँ हम काँध चढ़ाय ।। 46 ।।

 अचल सख्य सुग्रीवक सङ्ग । थोड़बहि दिनमे सङ्कट भङ्ग ।। 47 ।।

रामक कर-शर बालिक मरण । भव-जलनिधि बाली सन्तरण ।। 48 ।।

से सुग्रीव पठाओल दूत । दशदिश वानर वीर बहुत ।। 49 ।।

चलयित कहलनि श्रीरघुनाथ । कार्य्य-सिद्धि कपि अहँइक हाथ ।। 50 ।।

सानुज हमर कुशल सभ्माषि।  देव मुद्रिका आगाँ राखि ।। 51 ।।

रामक चर प्रभु-मुद्रा सङ्ग । रावण-गण मन कीट पतङ्ग ।। 52।।

यहि मे तनिक लिखल अछि नाम । देल चिन्हारय कारण राम ।। 53 ।।



।। षट्पद।।



निर्धन करथि कुबेर, कुबेर करथि प्रभु निर्धन ।। 54 ।।

जे चाहथि से करथि, देव कौशल्या-नन्दन ।। 55 ।।

हम आयल छी सिन्धु फानि, देखल लङ्का-भट ।। 56 ।।

हमरहु ई सामर्थ्य, दशानन मारी चटपट ।। 57 ।।

लेल जाय प्रभु-मुद्रिका, मानी जनु किछु आन मन ।। 58 ।।

प्रणत ठाढ़ दय मुद्रिका, हाथ जोड़ि रहला तखन ।। 59 ।।



।। चौपाई ।।



चिन्हल मुद्रिका माथा धयल । कत विलाप कनइत तत कयल ।। 60 ।।

कियक कयल रघुवर-कर त्याग । हमरे सन की भेल अभाग ।। 61 ।।

राम भवन वन हम अहँ बाट । सब जनि स्नान कयल एक घाट ।। 62 ।।

के कर वनिता-जन विश्वास । कहु कहु मुद्रा वचन प्रकाश ।। 63 ।।

प्राण-वान कपि कयलहुँ आय । मरितहूँ एहिखन सङ्कट पाय ।। 64 ।।

प्रभुकाँ अहँक सदृश नहि आन । हमरहु भेल विदित अनुमान ।। 65 ।।

हमरा निकट पठाओल नाथ । देल मुद्रिका अहँइक हाथ ।। 66 ।।

गञ्जन दुःख देखल प्रत्यक्ष । कहबनि सानुज प्रभुक समक्ष ।। 67 ।।

दया करथु आबथु राघुनाथ । यम-घर पहुँच शीघ्र दशमाथ ।। 68 ।।

दूइ मास जखना बिति जायत । नहि जौँ अयोता राक्षस खायत ।। 69 ।।

कपिपति सहित सैन्य समुदाय । लय आबयु सङ्क छुटि जाय ।। 70 ।।

यावत नहि रावण-संहार । ताबत हमरा कारागार ।।  71 ।।

तेहन उपाय करब हनुमान । सत्वर रावण त्यागय प्राण ।।  72 ।।

मारुत-सुत कह शुनू जगदम्ब । हमरा जयबा धरिक बिलम्ब ।।  73 ।।

ककरा रावण कयल न आट । हुनका यमघर गेलहिँ बाट ।।  74 ।।

सायुध अयोता लक्ष्मण राम । अहँ काँ लय जयता निज धाम ।।  75 ।।

पूछल जानकी कहु कहु कीश । कुशल करथु अहँ काँ जगदीश ।।  76 ।।



।। चरणकुल दोहा।।



लाँघि समुद्र सहित कपिसेना, सानुज करुणागेह ।।  77 ।।

अयोता कोन उपाय कहू कपि, हमरा मन सन्देह ।।  78 ।।



।। चौपाई।।



हमरा काँध चढ़ल दुहु बन्धु। अयोता लाँघि अगम्य कि सिन्धु ।।  79 ।।

सैन्य सहित कपि बालिक भाय । सभकेँ लओता गगन उड़ाय ।।  80 ।।

से कर रावण सगण विनाश । हुनका नहि रण कालक त्रास ।।  81 ।।

आज्ञा देल जाय हम जाउ । रावणारि केँ सत्वर लाउ ।।  82 ।।

देल मुद्रिका परिचय काज । प्रत्यय-पात्र हमहुँ तैँ आज ।।  83 ।।

परिचायक किछु भेटय तेहन । कहब शुनल देखल अछि जेहन ।।  84 ।।

चूड़ामणि देल सहित विचार । दीना दीनदयालुक दार ।।  85 ।।

कागत मसि नहि अछि यहि ठाम । कोटि कोटि कहि देब प्रणाम ।।  86 ।।

जिबइत छथि जानकि तहि देश । दशमुख विशभुज बस असुरेश ।।  87 ।।

चित्रकूट गिरि जखन निवास । गुप्त-कथा कहि देब प्रकाश ।।  88 ।।

शयित छला प्रभु हमरा अङ्क । सुख सुषुप्ति प्रिय काँ निश्शङ्क ।।  89 ।।

इन्द्रक बालक कालक फेर । काक बनल आयल ओहि बेर ।।  90 ।।

चरणाङ्गुष्ठ मे चञ्चु प्रहार । अबितहिँ कयलक रहित-विचार ।।  91 ।।

के दुख देलक अहँकाँ दुष्ट । जगला लगला पुछय रुष्ट ।।  92 ।।

अपनहुँ देखल तखनहुँ काक । उड़ि उड़ि आबय निर्भय ताक ।।  93 ।।

चहलक पुन हम मारब लोल । उठल निवारण कारण घोल ।।  94 ।।

तृणकाँ लय दिव्यास्त्र बनाय । तनिकाँ ऊपर देल चलाय ।।  95 ।।

देखलनि ज्वलित अबै अछि बाण । कि कहब उड़ला लै के प्राण ।।  96 ।।

इन्द्रादिक नहि रक्षा कयल । फिरि घुरि पुन प्रभु-शरणे धयल ।।  97 ।।

त्राहि त्राहि राखू एहि बेरि । करब उपद्रव हम नहि फेरि ।।  98 ।।

चरण न छोड़ गेल लपटाय । अस्त्र अमोघ वृथा नहि जाय ।।  99 ।।

इन्द्रक बालक कौआ जाह । एक आँखि कय देबहु कनाह ।।  100 ।।

काक-स्वरूप ज्ञात संसार ।  आकृति जेहन तेहन व्यवहार ।।  101 ।।

से पौरुष से प्रभु रघुनाथ अजगुत जिबितहिँ अछि दशमाथ ।।  102 ।।

ई शुनि कहल तखन हनुमान । अयोता शीघ्र राम भगवान ।।  103 ।।

लङ्का नगरी सकल उजारि जयता घर घुरि रावण मारि ।।  104 ।।



।। दोहा।।



कहल जानकी अहिँक सन, कपिदल सूक्ष्म-शरीर ।।  105 ।।

युद्ध असम्भव असुर सौँ, नहि होइछ मन थीर ।।  106 ।।



।। कुण्डलिया।।



शुनइत सीता-वचन कपि, पुर्व्व-रूप बनि गेल ।।  107 ।।

कनक शैल-शंकाश तन, मन अति हर्षित भेल ।।  108 ।।

मन अति हर्षित भेल, कहल सभ गुण अहँ आगर ।।  109 ।।

मेरु सदृश अहँ मथित, करब रावण-बल-सागर ।।  110 ।।

देखति राक्षसि लोक, एखन धरि नहि अछि जनइत ।।  111 ।।

कुशल प्रभुक तट जाउ, कहब जे छल छी शुनइत ।।  112 ।।



।। कवित्त रूपक घनाक्षरी।।



बड़ हम भूषल चलल नहि जाइ अछि ।।  113 ।।

आज्ञा देल जाय जाय हम फल किछु खाय लेब ।।  114 ।।

‘चन्द्र’ भन रामचन्द्र-चरण-भरोस मन ।।  115।।

अपनैँक पदधूरि माथ मे लगाय लेब ।।  116 ।।

चलल प्रबल पवमान हनुमान वीर ।।  117 ।।

मनमे कहल फल खाय केँ अघाय लेब ।।  118 ।।

प्रभुक विमुख दश-मुखक सन्मुख जाय ।।  119 ।।

शूरता देखाय नाम अपन बजाय लेब ।।  120 ।।

तड़पि तड़पि तत तरु तड़ तड़ तोड़ि ।।  121 ।।

रोक  के अशोक-वर-वाटिका उजाड़ि देल ।।  122 ।।

रहल न चैत्य तरु महल ढहल कत ।।  123 ।।

सीताक निवास शिंशपाक तरु छाड़ि देल ।।  124 ।।

पकड़ पकड़ कपि जाय न पड़ाय कहुँ ।।  125 ।।

कहल तानिकाँ मारि पृथ्वी मे पाड़ि देल ।।  126 ।।

लङ्कापुर जाय जहाँ सङ्गी न सहाय ।।  127 ।।

तहाँ मारुत-नन्दन रौद्र वीरता उघाड़ि देल ।।  128 ।।



।। चौपाई।।



विकटा-गण मन गेलि डराय । कल कौशल सीता लग जाय ।।  129 ।।

कहु कहु जानकि कपि निर्भीक । बुझला जाइछ थिकथि अहीँके ।।  130 ।।

बजइत छलहुँ कलपि किछु सञ्च । चुप चुप कयल कि अहाँ प्रपञ्च ।।  131 ।।

हमरा त्रास अहाँ निस्त्रास । मन मे जनु दृढ भय गेल आश ।।  132 ।।

कनइत छलहुँ भेलहुँ  अछि चूप । देखि पड़ आनन हर्षक रूप ।।  133 ।।

जानकि कहू करी जनु लाथ । कहिया अओता पति रघुनाथ ।।  134 ।।

सभ जनि शुनू विपतलि कि बाज । थिक प्रपञ्च किछु राक्षस-राज ।।  135 ।।

अपनहिँ सभहिँ कहू की थिक । राक्षस माया-ज्ञान अधीक ।।  136 ।।

राक्षसि-दशा कहल की जाय । गमहि गमहि सभ गेलि पड़ाय ।।  137 ।।



।। दोहा।।



सीता कारागार मे, यामिक दनुजी जानि ।।  138 ।।

दशमुख पूछलनि कह कुशल, भयभीता अनुमानि ।।  139 ।।



।। दोवय छन्द।।



त्रास देखाय करू वश सीता, कहल भेल की अयलहुँ ।।  140 ।।

सीताकाँ एकसरि की त्यागल, एको जनि उचित न कयलहुँ ।।  141 ।।

दशमुख-वचन शुनल से कहलनि, सेवा कयल अघयलहुँ ।।  142 ।।

मर्क्कट एहन विकट नहि देखल, लय लय प्राण पड़यलहुँ ।।  143 ।।

रक्षक मध्य एको जन नहि छथि, तनिके वार्त्ता लयलहुँ ।।  144 ।।

सकल अशोक वाटिका उजड़ल, सीता निकट नुकयलहुँ ।।  145 ।।

राजकीय पन्थैँ के सञ्चर, उबटे पथ धय अयलहुँ ।।  146 ।।

सीता त्रास देखाबय गेलहुँ, अपनहिँ तत्रासित भेलहुँ ।।  147 ।।



 ।। पदाकुल दोहा।।



सीता मन आनन्दित देखल, पूछलैँ कयलनि लाथ ।।  148 ।।

हुनकर रङ्ग तेहन सन देखल, लङ्का-जय जनु हाथ ।।  149 ।।

निर्भय कपि की सहजहिँ जायत, भिड़ता से मरताह ।।  150 ।।

कालरूप कपि सङ्गर भेलैँ, नहि घर केओ घुरताह ।।  151 ।।



।। घनाक्षरी ।।



जानकी निकट हम जायब कि घूरि पुन ।।  152 ।।

कनक-भूधर सन वानर विशाल से ।।  153 ।।

काँच ओ पाकल फल एको न बचल हाय ।।  154 ।।

खाय सभ गेल कत गोट मुह गाल से ।।  155 ।।

आयल कहाँ सौँ कहाँ छल हम देखल न ।।  156 ।।

बाल दिनकर सन बड़ मुह लाल से ।।  157 ।।

देखू दशभाल की अशोक-वन हाल भेल ।।  158 ।।

मरि गेल रक्षक बेहट्ट कपि काल से ।।  159 ।।



।। दोबय छन्दः ।।



शुनितहिँ शीघ्र पठाओल सेना, बहुत निकट भट गेला ।।  160 ।।

लोहदण्ड-धर जहँ उदण्ड कपि, तनिकर सन्मुख भेला ।।  161 ।।

सिंहनाद कय सभकाँ मारल, नहि रण मे कपि हारल ।।  162 ।।

अर्द्ध-मरण सभ भेल कतो जन, रावण निकट पुकारल ।।  163 ।।

महाकाल वानर-तन धयलनि लङ्का-नाशक कारण ।।  164 ।।

क्षणमे विपिन अशोक उजाड़ल, फल-चय कयलनि पारण ।।  165 ।।

साहस लङ्का निर्भय आयल, के करताह निवारण ।।  166 ।।

लङ्कापति अपनहुँ चलि देखू, की थिक करू निर्धारण ।।  167 ।।



।। रूपमाला ।।



गेल छल सङ्ग्राम किङ्कर, निहत शुनि दशभाल ।।  168 ।।

कोप सौँ सत्वर पठाओल पाँच सेना-पाल ।।  169 ।।

स्तम्भ लौहक हाथ लयकैँ, तनिक तेहन हाल ।।  170 ।।

कयल मारुत-तनय विजयी, समरमे तत्काल ।।  171 ।।

तखन मन्त्रिक सात बालक, युद्ध उद्यत भेल ।।  172 ।।

क्रोध सौँ रावण पठाओल, गेल इर्ष्या लेल ।।  173 ।।

सकल जनकेँ मारि मारुत-तनय पुन तहि ठाम ।।  174 ।।

स्तम्भ लौहक अस्त्र एकटा, जितल भल संग्राम ।।  175 ।।



।। चौपाई।।



अगुआ चलला अक्षयकुमार । कयल बहुत सेना सहिआर ।।  176 ।।

ततय बाट तकितहिँ हनुमान । के पुन अओता जयतनि प्राण ।।  177 ।।

अबइत देखल अक्षयकुमार । मनमन मानल हर्ष अपार ।।  178 ।।

मुदगर कर लय उड़ल आकाश । सत्वर हिनकर करब विनाश ।।  179 ।।

मुदगर लय कर लगले घूरि । रावण-सुतक माथ देल चूरि ।।  180 ।।

रणमे माँचल हाहाकार । मुइला मुइला अक्षयकुमार ।।  181 ।।

कन्नारोहट उठ बड़ घोल । लड़त कहाँ के भभरल गोल ।।  182 ।।

सेना लड़ि लेलक भरिपोष । के सह मारुत-नन्दन रोष ।।  183 ।।

वार्ता विदित भेल दरबार । नहि छथि जिबइत अक्षयकुमार ।।  184 ।।

शुनि  रावणमन पैशल शोक । बाहर छल भल बुझय न लोक ।।  185 ।।

छल छथि अतिबल प्रबल प्रताप । रावण सन जनिकाँ छथि बाप ।।  186 ।।

 मेघनाद सन जनिकाँ भाय । वानर-हाथ मरण अन्याय ।।  187 ।।

लङ्कापति-मन कोप अपार । मेघनाद सौँ कयल विचार ।।  188 ।।

कय बेरि बजला भेल अन्धेरि । हम अपनहिँ जायब एहि बेरि ।।  189 ।।

अक्षयकुमारक अरि जहिठाम । ततय जाय जोतब सङ्ग्राम ।।  190 ।।

मारब अथवा बाँधब जाय । अहँइक लग हम देब’ पहुँचाय ।।  191 ।।

मेघनाद कहलनि शुनु तात । बानर कयलक अछि उत्पात ।।  192 ।।

शोक-वचन जनु बाजल जाय । हम जिबइत छी अक्षयक भाय ।।  193 ।।

आनब अपनेक निकट बझय । हमर पराक्रम देखल जाय ।।  194 ।।



 ।। चरणाकुल दोहा।।



ई कहि रथ चढ़ि राक्षस भट लय, मेघनाद चललाह ।।  195 ।।

मारुत-नन्दन शत्रु-निकन्दन, कपिवर जतय छलाह ।।  196 ।।



।। चौपाई।।



की रावण रावण-सन आन । अबइछ होइछ मन अनुमान ।।  197 ।।

गरजल गरुड़ जकाँ नभ जाय । स्तम्भ महामोट हाथ उठाय ।।  198 ।।

घुमइत गगन छला हनुमान । रावण-पुत्र चलौलक बाण ।।  199 ।।

आठ ह्रदयमे माथा पाँच । युगल चरण मे छयो नाराच ।।  200 ।।

पुच्छ मध्य मारल एक बाण । मारि कयल धुनि सिंह-समान ।।  201 ।।

कोप-विवश मारुत-सुत घूरि । रथ घोड़ा सारथि देल चूरि ।।  202 ।।

दोसर रथ चढ़ि आयल फेरि । कहल तोहर दुर्गति यहि बेरि ।।  203 ।।

नहि जीतब मन बुझल जखन । ब्रह्मास्त्रैँ कपि बाँधल तखन ।।  204 ।।

ब्रह्मास्त्रक कपि राखाल मान । अपनहि बझला मन किछु आन ।।  205 ।।

बाँधल बाँधल भय गेल सोर । यहन विश्व नहि घातो चोर ।।  206 ।।

बाँधल अछि लय चलु दरबार । करब तेहन जे दशक विचार ।।  207 ।।

जीवम्मुक्त थिकथि हनुमान । कि करत तनिका बन्धन आन ।।  208 ।।

राम-चरण-पङ्कज मन धयल । मारुत सुत बड़ लीला कयल ।।  209 ।।



इति श्री चन्द्रकवि-बिरचिते मिथिला-भाषा रामायणे सुन्दरकाण्डे तृतीयोऽध्यायः 



  



।। अथ चतुर्थोऽध्यायः ।।



।। चौपाई ।।



बाँधल काँ पुरजन मिलि मार । कौतुक पहुँचल दशमुख-द्वार ।।  1 ।।

त्रास-हीन हर्षित हनुमान । केवल कौशलेश-पद ध्यान ।।  2 ।।

मारि गारि सबहिक सहि लेथि । पामर काँ नहि उत्तर देथि ।।  3 ।।

मेघनाद कहलनि शुनू तात । कयलक ई वानर उत्पात ।।  4 ।।

ब्रह्मास्त्रैँ हम जीतल जखन । वानर वशमे आयल तखन ।।  5 ।।

कहल जाय की समुचित मन्त्र । वानर काँ नहि करब स्वतन्त्र ।।  6 ।।

लौकिक वानर सन नहि कर्म्म । अपनहिँ जानब हिनकर मर्म्म ।।  7 ।।

ताकि प्रहस्त सचिव सौँ कहल । विषय विचार करक जे रहल ।।  8 ।।

पुछू वानर केँ मन्त्रि प्रहस्त । बौआयल कपि कालक ग्रस्त ।।  9 ।।

की आयल अछि की अछि काज । वानर सौँ बजइत हो लाज ।।  10 ।।

कथि लय कयलक उपवन नाश । राक्षस वध करइत नहि त्रास ।।  11 ।।

कहलनि मन्त्रि प्रहस्त प्रकाश । कपि मनमे नहि मानब त्रास ।।  12 ।।

प्रेषित ककर कहब से साँच । प्राण अहाँक अवश्ये बाँध ।।  13 ।।

कहलनि हरि बड़ गोट मोर भाग । दूरक ढोल सोहाओन लाग ।।  14 ।।



।। दोवय छन्दः।।



भूषल छलहुँ सङ्ग नहि खर्चा, तोड़ि तोड़ि फल कयलहुँ ।।  15 ।।

रक्षक लण्ठ प्राण लेबा पर, बहुत नेहोरा खयलहुँ ।।  16 ।।

कान कपार एक नहि बुझल, पातैँ पात नुकयलहुँ ।।  17 ।।

अपन स्वरूप धयल हम सभकाँ, कालक धाम पठयलहुँ ।।  18 ।।

पहिलय मारि बहुत हम सहलहुँ, पाछाँ अनुचित कयलहुँ ।।  19 ।।

दश-मस्तक लङ्कापति राजा, की अपने खिसिअयलहुँ ।।  20 ।।

एक गोट वानर पर एते, सेना व्यर्थ पठयलहुँ ।।  21 ।।

धर्म्म-शास्त्र-वेत्ता अपनैँ सन, न्याय करू अगुतयलहुँ ।।  22 ।।



।। रावणोक्ति।।

।। बसन्त-तिलका छन्दः।।



के तोँ थिकाँहि कत सौँ यत आबि गेलैँ ।।  23 ।।

की नाम तोहर निशाचर-भक्ष्य भेलैँ ।।  24 ।।

आज्ञा-विहीन फल तोड़ि बहुत खेलैँ ।।  25 ।।

तिर्हेतु रक्षक तहाँ किय मारि देलैँ ।।  26 ।।



।। हनुमानक उक्ति।।



रे दुष्ट लागल क्षुधा फल तोड़ि खेलौ ।।  27 ।।

कैलैँ उपद्रव ततै तरु तोड़ि देलौ ।।  28 ।।

हेतौ बहूत नहि सम्प्रति विघ्न भेलौ ।।  29 ।।

अस्त्र-प्रहार कयलैँ हम प्राण लेलौ ।।  30 ।।



 ।। मालिनी-छन्दः।।



राघुपतिक पठौलैँ लाँघि केँ सिन्धु एलौ ।।  31 ।।

तनिक कुशल-वार्त्ता जानकी कैँ शुनेलौ ।।  32 ।।

क्षुधित बहुत भेलैँ तैँ फलाहार कैलौ ।।  33 ।।

मरुत-सुत हनुमान्नाम की बाँधि लेलौ ।।  34 ।।

किछु दिन रहि लङ्का सिन्धु केँ फानि जैबे ।।  35 ।।

जनक-नृपति-पुत्री दुःख वार्त्ता शुनैबे ।।  36 ।।

प्रबल सकल सेना सङ्ग लै फेरि ऐबे ।।  37 ।।

तखन बुझब जे छी से आहाकाँ बुझैबै ।।  38 ।।



।। भुजङ्गप्रयात छन्दः।।



चिन्हारे अहाँ छी विरञ्चि-प्रपौत्रे ।।  39 ।।

कुकर्म्मी अहाँ छी करैछी कि श्रैत्रे ।।  40 ।।

गिरिशार्च्चना छोड़ि ई की करै छी ।।  41 ।।

परस्त्री अहाँ छद्म सौँ की हरैछी ।।  42 ।।



।। चौपाई।।



लङ्कापति हमछी निर्भित । फेरि गबैछी गओले गीत ।।  43।।

ब्रह्म विष्णु रामक अवतार । के गुण कहत हुनक विस्तार ।।  44 ।।

वेद न पाबथि कहयित पार । जनिकर सिरजल थिक संसार ।।  45 ।।

तनिकर माया सीता-रूप । हरि आनल वनसौँ चूप ।।  46 ।।

गञ्जन बन्धन कर्म्मक भोग । अयलहुँ नदिया-नाव-संयोग ।।  47 ।।

तनिकर दूत चोर हम धयल । करब उपाय एखन की कयल ।।  48 ।।

अनुभव बाली-बल विस्तार । तनिक राम कयलनि संहार ।।  49 ।।

दीनक झेर देखल दरबार । अयलहुँ दबि छपि सागर पार ।।  50 ।।

राम-सख्य सुग्रीवक सङ्ग । किछु दिन बितलय देखब रङ्ग ।।  51 ।।

कपिपति सचिव थिकहुँ हनुमान । अञ्जनि जननि जनक पवमान ।।  52 ।।

वानर चर फिरइछ सभ ठाम । हम लङ्का अयलहुँ शुनि नाम ।।  53 ।।

निति धर्म्म हम देल शुनाय । सत्य कहय से मारल जाय ।।  54 ।।

ह्रदय अहाँक अधिक अछि मैल । झिटुकी सौँ फुटि जाइछ घैल ।।  55 ।।

प्रभुक कुशल सीता सँ भाषि । लोभ भेल एक फल केँ चाषि ।।  56 ।।

लोभहिँ पतन कहय संसार । हमरा अपनहि पड़ल कपार ।।  57 ।।

बड़ गोट वंश ओ विस्तर राज । अपशक नहि किछु मनमे लाज ।।  58 ।।

करब न अहँसौँ किछु हम लाथ । अहँक नीक रघुनन्दन-हाथ ।।  59 ।।

पण्डित वेश कुपथ की धयल । हाथो सौँ हथि-बेसन कयल ।।  60 ।।

हमरा मारल बाँधल बेश । बुद्धि – वृद्धि हो लगलेँ ठेस ।।  61 ।।

हति बजला तखना दशकण्ठ । ई वानर अछि बड़का लण्ठ ।।  62 ।।

मृत्सम बाँधल मन अभिमान । हमरहु निकट छटै अछि ज्ञान ।।  63 ।।

मानुष राम गहन मे वास । हमरा तकर देखाबै त्रास ।।  64 ।।

तनिका मारब दनुज पठाय । वानर बिलटत रहति-सहाय ।।  65 ।।

सीता-कारण अछि उत्पात । करब तनिक हम प्राणक-घात ।।  66 ।।

सनकल अछि कपि बड़ वाचाल । हिनका माथ नचै अछि काल ।।  67 ।।

मारुत-नन्दन उत्तर कहल । रावण-कुवचन एक न सहल ।।  68 ।। 



द्वितीय त्रिभंगी छन्द



दशमुख-वचन शुनल कपि कहलनि ।।  69।।

 चुप रे अभिमानी, करतौ हानि, कटु बानी ।।  70 ।।

प्रभुकर-शरक निकर विषधर सन ।।  71 ।।

लागलैँ के बच प्रानी, शठ अज्ञानी, वक-ध्यानी ।।  72 ।। 𑒢

अपनहिँ मन नृप बनल सनल छह ।।  73 ।।

कहतौ के गुरु तोरा, शुनू स्त्री-चोर, कुल बोरा ।।  74 ।।

हित अनहित अनहित हित कयलह ।।  75 ।।

प्रभुक न कयल निहोरा, मति घोरा, शुभ थोरा ।।  76 ।।



घनाक्षरी



सत्य हनुमान तौँ प्रमाण ई वचन जान ।।  77 ।।

मर्क्कट विकट भालू-भट वश परबैँ ।।  78 ।।

प्रभु-दल प्रबल जखन उतरत इत ।।  79 ।।

दशमुख तखन उपाय कोन करबैँ ।।  80 ।।

मुष्टिका-अघात लात-लात -सन्निपात वश ।।  81 ।।

शोचवश रण मे त्राहि त्राहिकैँ कहरबैँ ।।  82 ।।

“चन्द्र” भन रामचन्द्र सर्व्वनाश-हाथ-तीर ।।  83 ।।

लगतहु जखन तखन मूढ़ मरबैँ ।।  84 ।।



चौपाई



मारुत-वचन शुनल लङ्केश । कोप-विवश जन देल निदेश ।।  85 ।।

हम कटु वचन शुनै छी कान । वानर बजइछ आनक आन ।।  86 ।।

हिनका मारय लय कय खण्ड । हिनकर सभ छूटय पाखण्ड ।।  87 ।।

कपिकाँ मारय दौड़ल जखन । अयला सभा विभीषण तखन ।।  88 ।।

कहलनि नितिशास्त्र – अनुसार । चारक वध नहि अछि व्यवहार ।।  89 ।।

दूत बेचारा मारल जयत । रामचन्द्र सौँ युद्ध न हयत  ।।  90।।

अङ्कित हयता कहता जाय । राखक नहि थिक दूत बझाय ।।  91 ।।

निति विभीषण कहलहुँ नीक । मानल वचन सदर्थ अहीँक ।।  92 ।।

शण मन बहुत वस्त्र घृत तेल । ढेर भेल नृप आज्ञा देल ।।  93 ।।

कपि – वालधि मे सभ लपटाब। कौतुक करइत नृपति हसाब ।।  94 ।।

किछु तहि ऊपर आगि लगाब। के बुझ भावि काल स्वभाव ।।  95 ।।

मारथि गारि देथि कय बेरि। योगी सौँ कयलनि धुरखेरि ।।  96 ।।

नाना तरहक बाजन बाज। प्रबल चोर काँ पकड़ल आज ।।  97 ।।

पश्चिम द्वार पवन – सुत जाय। बन्धन लेलनि सहज छाड़ाय ।।  98 ।।

सूक्ष्मरूप सौँ गेल बहराय। सभ राक्षस-मन देल शुखाय ।।  99 ।।

सभ जन ह्रदय कदलि सन काँप । जनु कपि भेल चोटाओल साप ।।  100 ।।

कपिकाँ मन मे अछि बड़ रोष । करत उपद्रव पुन भरि पोष ।।  101 ।।

रावण-सभा उठल घमलौड़ि । ऐठन जरल न जरि गेल जौड़ि ।।  102 ।।

के थिक केहन न कयल विचार । मूर्खक लाठी माँझ कपार ।।  103 ।।

के कह कपि कपि – रूपी काल । नहि बुझ लङ्कापति दशभाल ।।  104 ।।



घनाक्षरी



अग्निमान त्रिकुट – अचल अनुमान भेल ।।  105 ।।

घूम – घार नभ घन प्रलय समान रे ।।  106 ।।

आगि आगि पानि भेल धह धह छानि भेल ।।  107 ।।

कपि-मन आनि भेल सङ्ग पवमान रे ।।  108 ।।

वानर न जानि भेल हसयित हानि भेल ।।  109 ।।

हास्य राजधानी भेल रावण मलान रे ।।  110 ।।

आनही सौँ आन भेल सर्व्व सावधान भेल ।।  111 ।।

रावण-प्रताप हर हरि हनुमान रे ।।  112 ।।



चौपाइ



बहल बहल तत प्रलय बिहाड़ि। जनु पर्व्व्त काँ देत उखाड़ि ।।  113 ।।

कपिक पूछ में धधकल आगि। विकल पड़ायल सभ घर त्यागि ।।  114 ।।

गोपुर ऊपर कपि चढ़ि फानि। सभ मन छूटल मारिक बानि ।।  115 ।।

गरजि गरजि कपि ठोकल ताल। राड़क असँघै जीवक जञ्जाल ।।  116 ।।



रूपक घनाक्षरी



गगन अनिल ओ अनल जल महि विश्व ।।  117 ।।

सिरिजल जनिक तनिक दूत जरबहु ।।  118 ।।

कोटि कोटि रावण ससमान गण लड़बह ।।  119 ।।

मृगगणा – मारक मृगेन्द्र जकाँ पड़बहुँ ।।  120 ।।

दखल प्रचण्ड रण हमर उदण्ड बल ।।  121 ।।

भेल आब कोप अभिमान लोप करबहु ।।  122 ।।

कालहुक काल विकराल सौँ नै भोति अछि ।।  123 ।।

तोहरा लोकनि बूतै हम कतै मरबहु ।।  124 ।।



चौपाई



जरय न कपि जारइत अछि गाम। कह जन भेल विधाता वाम ।।  125 ।।

लोहस्तम्भ कपिक अछि हाथ। जे लग भिड़थिन फोड़थिन माँथ ।।  126 ।।

सगर नगर अनल क सञ्चार । विना विभीषण घर ओ द्वार ।।  127 ।।

धर धर कहथि निकट नहि जाथि । हाथी कुक्कुर रीति डराथि ।।  128 ।।

पोटथि छाती वनिता कानि । कपि-उतपात भेल सभ हानि ।।  129 ।।

जरल कनक -मणिमय वर गेह । सम्पति रह की पाप-सिनेह ।।  130 ।।

दूत-पराक्रम कहल न जाय । भागवान काँ भूत कमाय ।।  131 ।।

कपि कह लङ्का करब विनाश । घैल काँच केँ मुगरक आश ।।  132 ।।

धिक रावण आनल न मलान । चोरक मुह जनु चमकय चान ।।  133 ।।

दशकन्धर की रहबह चैन । भल-घर-मध देलह अछि बैन ।।  134 ।।

हनुमान लग केओ न जाय। मारिक डर सौँ भूत पड़ाय ।।  135 ।।



घनाक्षरी



अनुचित भेल न विचार दृढ कय लेल ।।  136 ।।

छोड़ि देल वानर विकट अधबध कै ।।  137 ।।

दिन भेल वक्र आब ककरो न शक अछि ।।  138 ।।

एक छानि आगि तौँ हजार घर धधकै ।।  139 ।।

प्रलय-कृशानु सन तखनुक भानु सन ।।  140 ।।

वीर हनुमान सनमुख जित-युधकै ।।  141 ।।

ताल घहराय के वारण करै जाय ।।  142 ।।

जत कयल अन्याय फल रावण अबुध कै ।।  143 ।।



शिखरिणी छन्दः



अरे बाबा दावानल-सदृश लङ्का जरइयै ।।  144 ।।

अधर्म्मी लङ्केशे तनिक सभ पापे करइयै ।।  145 ।।

पड़ा रे रे बाबु किछु न मन काबू परइयै ।।  146 ।।

विना पानि लङ्का-नृपति पट-रानी मरइयै ।।  147 ।।



नाराच



पड़ा पड़ा बड़ा बड़ा गृहाट्ट जारि देलकौ ।।  148 ।।

विदेह-कन्याका-विपत्ति जानि कानि लेलकौ ।।  149 ।।

बहुत छोट वानरे सभैक हाल कैलकौ ।।  150 ।।

प्रचण्ड दण्ड-देनिहार दूत चोर धैलकौ ।।  151।।



समानिका



मेघनाद की कहू, बुद्धि – होन छो अहूँ ।।  152 ।।

बाप पापकैल को, मृत्यु-मार्ग धैल को ।।  153 ।।



दोवय छन्दः



हरि-पद-विमुख कतहु सुख पाबथि, धिक थिक दशमुख – ज्ञाने ।।  154 ।।

दुर्गति कय कपि लङ्को जारय, धायलहिँ छथि अभिमाने ।।  155 ।।

एहि सौँ आब कि गञ्जन देखता, मरणाधिक अपमाने ।।  156 ।।

के कपि पकड़ लड़य के काल सौँ, नहि कपि-वीर समाने ।।  157 ।।



चौपाई



लङ्का-नगर सागर कपि डाह स्वामि-कार्य्य शूरित्व निर्वाह ।।  158 ।।

कुदि खसला सागर मे जाय पुच्छल बाँधल आगि मिझाय ।।  159 ।।

स्वस्थ -चित भेला हनुमान यहन पराक्रम कर के आन ।।  160 ।।

सीता-आशीष-बल नहि जरल लङ्कापति गर्व्व सभ हरल ।।  161 ।।

 अग्नि वायु दुनु थिकथि इयार जरल न सखि – सम्बन्ध विचार ।।  162 ।।

जनिक नाम जपि छूट तिन ताप भवकृत – दोष – लेश नहि व्याप ।।  163 ।।

तनि रघुवरक दूतवर जानि प्राकृत आनल कयल नहि हानि ।।  164 ।।

हनुमानक डर केओ नहि बाज जनु कपि पायोल रामक राज ।।  165 ।।

जनकनन्दिनी छलि जहि ठाम घुरी पुन तनिकर कयल प्रणाम ।।  166 ।।

सानुज प्रभुवर अयाता तखन जननि ततय पहुँचब हम जखन ।।  167 ।।

तीनि प्रदक्षिण ई कहि देल आगाँ ठाढ़ जोड़ि कर भेल ।।  168 ।।

जे किछु बनल कयल हम काज दशकन्धर निर्ल्लज्ज कि वाज ।।  169 ।।

कहल जानकी शुनु कपि धीर सकल -नियन्ता श्री रघुवीर ।।  170 ।।

तनिकर इच्छा होयत जेहन कार्य्य – सिद्धि होयत शुभ तेहन ।।  171 ।।



पदाकुल दोहा



ओरे से दिन बीतल । नयनक नोर तोर वसन तितल ।।  172 ।।

आबि एकगोट कपि रावण जितल । करमक लिखल कतहु नहि चल ।।  173 ।।

करू करू जानकी जि ह्रदय शीतल । लङ्कापुर जरइछ प्रलय अनल ।।  174 ।।

सुखपाख सभ जन रावण हीतल । “चन्द्र” भन ठाढ़ जनु प्रतिमा लिखल ।।  175 ।।



षट्पद छन्द



हम किङ्कर हनुमान, देवि चिन्ता चित परिहरु ।।  176 ।।

हमरा काँधा चढ़लि, घोर सागर काँ सन्तरु ।।  177 ।।

त्क्षण मे श्रीरघुनाथ निकट कौशल पहुँचायब ।।  178 ।।

आज्ञा प्रभुसौँ पाबि, फरि लङ्का घुरि  आयब ।।  179 ।।

प्रलय करब लङ्कापुरी, हमरा के रोकत सुभट ।।  180 ।।

जौँ ई रूचि हो स्वामिनी, देल जाय आज्ञा प्रगट ।।  181 ।।

शरसौँ शोषि समेद्र सेतुम शर – निकरक करता ।।  182 ।।

सानुज से प्रभु आबि, रावणक प्राणे हरता ।।  183 ।।

सुग्रीवक सभ सैन्य, आबि लङ्का कैँ लूटै ।।  184 ।।

सुयश लोक मे होयत, अचल लङ्कागढ़ टूटै ।।  185 ।।

हम मारुत-सुत प्राण काँ, कानहुँ यत्न राखब एतय ।।  186 ।।

कुशलत्क्षेम सौँ जाउ अहँ, श्रीरघुनन्दन छथि जतय ।।  187 ।।



दोबय



कयल प्रणाम अनेक वार कपिम पर्व्व्त पर चढ़ि गेला ।।  188 ।।

योजन तीश प्रमाण उच्च गिरि, समभूमिक सम भेला ।।  189 ।।

पर्व्वत वायु वेग सौँ महितल, दवि गेल तत्काले ।।  190 ।।

सागर तरथि घोर धुनि करइत, धर्म्मक सोर पताले ।।  191 ।।



चौपाई



अङ्गदादि कयलनि अनुमान। अबइत छथि हर्षित हनुमान ।।  192 ।।

शब्द एहेन करता के आन। श्रवण-सुखद वर अमृत समान ।।  193 ।।

एतहु सकल कपि बालि-किशोर । हर्षक शब्द कयल नहि थोर ।।  194 ।।

गिरि पर पहुँचि गेला हनुमान । मृतक देह जनु पलटल प्राण ।।  195 ।।

कार्य्यसिद्धि होइछ अनुमान । हर्षक सुख मुख-शोभा आन ।।  196 ।।

शस्त्रक क्षत कत देखिय अङ्ग । भेल समर जनि लगइछ रङ्ग ।।  197 ।।

महावीर कह शुनू प्रिय सर्व्व । प्रभु-प्रताप किछु हमर न गर्व्व ।।  198 ।।

देखि जनकजा विपिन उजारि । रक्षक जन केँ रण मे मारि ।।  199 ।।

कि करब ततय पड़ल बड़ मारि । राम-प्रताप कतहु नहि हारि ।।  200 ।।

दशकन्धर सौँ वाद विवाद । बचलहुँ श्री रघुनाथ-प्रासाद ।।  201 ।।

अयलहुँ बहुत सुभट केँ मारि । रावण-पालित लङ्का जारि ।।  202 ।।

राम-कपिशक तट हम जयब । एखनहि ततहि स्वस्थ हम हयब ।।  203 ।।

वानर -वृन्द मिलल भरि अङ्क । जेहन परशमणि पाबथि रङ्क ।।  204 ।।

पूछ चूमि गुणगण सभ बाँच । हरषि हरषि हरिगणा भल नाँच ।।  205 ।।



सारवती छन्दः



राम कहू पुन राम कहू, मारुत-नन्दन धन्य अहूँ ।।  206 ।।

आब चलू छथि नाथ जहाँ, की सुखलाभ अनन्त तहाँ ।।  207 ।।



सोरठा



चलल वीर-समुदाय, महावीर अज्ञआय चल ।।  208 ।।

प्रस्त्रवणाचल जाय कपिपति -मधुवन प्राप्त सभ ।।  209 ।।



दोवय छन्दः



वानर सकल कहल अङ्गद काँ, अहँ छो भूपक बालक ।।  210 ।।

आज्ञा देल जाय मधुवन -फल खायब अपनैँ पालक ।।  211 ।।

जनितहि छो सभ जन छो भुखले, फलमधु यहन न पायब पालक ।।  212 ।।

खाय पोबि सन्तुष्ट चित्तसौँ, प्रभुक निकट मे जायब पालक ।।  213 ।।



चौपाई



अङ्गद कहल सुखित फल खाउ । किछ नहि ककरो डरैँ डराउ ।।  214 ।।

कपि फल खाथि करथि मधुपान । रक्षक हटल पटल नहि मान ।।  215 ।।

दधिमुख – अनुशासन काँ पाय । देल रक्षक सभकैँ लठिआय ।।  216 ।।

अतिबल वानर भूखल घूरि । सभ रक्षक काँ देलनि चूरि ।।  217 ।।

दधिमुख-मुख भय गेल मलान । कुपित न बजला से मतिमान ।।  218 ।।

सभ रक्षक कैँ संग लागय । कपिपति काँ कहि देल देखाय ।।  219 ।।

तारा तनय हठी हनुमान । जेहन आगि केँ पवन दीवान ।।  220 ।।

मधुवन फल भल खयलय जाथि । किछु नहि अपनैक त्रास डराथि ।।  221 ।।

हम नहि करब विपिन रखबारि । किछु बजितौँ तौँ खइतहुँ मारि ।।  222 ।।

मधुवन फल राखल छल ढेर । लुटि भेल काकरहु नहि टेर ।।  223 ।।

युवराजक हनुमान प्रधान । विपिन विनाशक कि कहब ज्ञान ।।  224 ।।

हम छी कपि – भूपालक माम । नहि घुरि जायब गञ्जन ठाम ।।  225 ।।

सत्य कहै छी शुनू कपिनाथ । मर्य्यादा रह अपनहिँ हाथ ।।  226 ।।

मधुवन फल मधु कयलक नाश । भूतक घर सन्ततिक निवास ।।  227 ।।

शुनल वचन कहलनि जे माम । कपिपति-मन नहि कोपक ठाम ।।  228 ।।

हर्षक नोर भरल दुहु आँखि । अयला अयला उठला भाखि ।।  229 ।।

सीता देखि आयल हनुमान । हमरा मन से निश्चय ज्ञान ।।  230 ।।

से शुनि पुछलनि अपनहि राम । मारि भेल अछि की कोन ठाम ।।  231 ।।

की कहयित छथि कपिपति माम । लेल कि जनकनन्दिनी नाम ।।  232 ।।

कहलनि गेल जे दक्षिण देश । आयल सभ जन रहित कलेश ।।  233 ।।

कार्य्यसिद्धि कयलनि हनुमान । मधुवन फल के चाखत आन ।।  234 ।।

दधिमुखकाँ कहलनि अहँ जाउ । सभ जनकाँ सत्वर लय आउ ।।  235 ।।

बहुत शीघ्र से बन मे जाय । अङ्गदादि काँ कहल बुझाय ।।  236 ।।

रामचन्द्र लक्ष्मण कपिराज । बड़ सन्तुष्ट भेल छथि आज ।।  237 ।।

शीघ्र बजौलनि करू प्रयाण । भाग्य ककर तुल अहँक समान ।।  238 ।।

शुनतहिँ सकल जन तुष्ट । प्रभुक समक्ष मुदित-मन पुष्ट ।।  239 ।।

अङ्गद आदि सहित हनुमान । प्रणत कहल हरिभक्त – प्रधान ।।  240 ।।

मारुत-नन्दन जोड़ल हाथ । कृपा – जलधि जय जय रघुनाथ ।।  241 ।।

वैदेही हम देखल आँखि । कुशल प्रभुक विधिवत सम भाखि ।।  242 ।।



दोबय छन्दः



मलिनवसन एक-वेणी अतिदुख, निराहार दुबराइल ।।  243 ।।

राम राम रट सकरुण धुनि कय, शुद्ध समाधि समाइलि ।।  244 ।।

अहह अशोकवाटिकाभ्यन्तर, वृक्ष-शिंशुपा छाया ।।  245 ।।

लङ्कापुरी राक्षसी-घेड़लि, छथि प्रभु अपनैँक माया ।।  246 ।।

कि करब यत्न फुरल नहि आन कयल तखन रघुपति-गुण-गान ।।  247 ।।

जैँ विधि प्रभु लेलनि अवतार हरण हेतु पृथिविक खल-भार ।।  248 ।।

धनुषभङ्ग परिणय जे रीति सकल शुनाओल मङ्गल गीति ।।  249 ।।

अयला प्रभु जे विधि वनवास सकल कथा से कयल प्रकाश ।।  250 ।।

आश्रमशून्य जानि लङ्केश देवी हरि अनलक एहि देश ।।  251 ।।

कथा शुनथि वैदेही कान मन-मन करथि अनुमान ।।  252 ।।

मैत्री जैँ विधि कयल कपीश अपनाओल प्रभु अपना दीश ।।  253 ।।

अनुज-नारि-रत बालि विचार तानकाँ रघुपति सत्वर मारि ।।  254 ।।

से सुग्रीव विदित कपिराज सम्प्रति प्रभु छथि तनिक समाज ।।  255 ।।

तनिक सचिव हम श्रीपति-दास सीता देखक बहुत प्रयास ।।  256 ।।

से कोन देश कोन से ठाम दूत पठाओल जतय न राम ।।  257 ।।

आज फलित भेल हमर प्रयास मानस-दुःख-राशि भेल नाश ।।  258 ।।

तकलनि कहलनि अमृत-समान वचन शुनाओल के ई कान ।।  259 ।।

लोचन-गोचर से भय जाथु कहथु कथा नहि एखन नुकाथु ।।  260 ।।

दूरहि सौँ हम कयल प्रणाम अञ्जलि-बद्ध-ठाढ़ तहिठाम ।।  261 ।।

सूक्ष्म-रूप वानर आकार हम प्रभु-चरित कहल विस्तार ।।  262 ।।

परिचय पूछलनि पूछलनि नाम नर-वानर-सङ्गति कोन ठाम ।।  263 ।।

स्वामिनी कथा पूछल जय बेरि हमहुँ शुनाओल से सभ फेरि ।।  264 ।।

प्रत्ययमूल मुद्रिका देल तखन प्रतीति तनिक मन भेल ।।  265 ।।



घनाक्षरी छन्द



गञ्जन ताड़न राक्षसीक सहै पड़इछ, एहेन विपति पड़उन जनु अनका ।।  266 ।।

हमर विपत्ति देखतहिँ छीय अपनहुँ, सपनहुँ चैन नहि दिन राति मनकाँ ।।  267 ।।

जनु मन राखथु हमर अपराध किछु, निवेदन कय देब धरणी-धरण काँ ।।  268 ।।

सकरुणा सजल-नयन देवी कहलनि, कहबनि अहाँ कपि विपति-हरण काँ ।।  269 ।।



चौपाई



सीता वचन करूण-परिपूर । शुनि शुनि कि करब से नहि फूर ।।  270 ।।

हे प्रभु कहलहुँ बहुत बुझाय । तनि घन-नयन न नोर सुखाय ।।  271 ।।

कर औँठी कङ्कण प्रभु-हाथ । तूअ वियोग भृश कृश रघुनाथ ।।  272 ।।

जायब अभिज्ञान काँ पाय । देल जाय श्रीजानकि माय ।।  273 ।।

चूड़ामणि देलनि कहि कानि । कत हम कयल विरञ्चिक हानि ।।  274 ।।

वासवसुत वायस वनवास । खल छल पहँचल मन निस्त्रास ।।  275 ।।

फल भाल पौलनि स्वामि-समीप । भय भ्रमि अयला सातो दीप ।।  276 ।।

अति सामर्थ्य प्रभुक सभ काल । के थिक  दुर्न्नन्य  खल दशभाल ।।  277 ।।

प्रभु-पत्नी पाबिय दुख घोर । जलधर जितल अखण्डित नोर ।।  278 ।।

देवर काँ हम वचन कठोर । कहल तकर फल भेल न थोर ।।  279 ।।

अनुचित क्षमा करत के आन । कहब दयामय देवर-कान ।।  280 ।।

संकट सौँ लय जाथि छोड़ाय । प्रभुक अनुज से करथु उपाय ।।  281 ।।

चलि नहि रहि नहि हाँ तहिठाम । आज्ञा विनु कत करू सङ्गम ।।  282 ।।

विकल स्वामिनी-दशा निहारि । चलयित कयलहुँ विपिन उजारि ।।  283 ।।

भेल लड़ाइ तहाँ घमासान । बहुत वीर समरहिँ निःप्राण ।।  284 ।।

दशवदनक सुत अक्षय कुमार । हमरहि सौँ तनिकर संहार ।।  285 ।।

मेघनाद आयल खिसिआय । रण निर्ज्जित कयलक अन्याय ।।  286 ।।

ब्रह्मास्त्र से कयल प्रयोग । बाँधल गेलहुँ कयल दुख-भोग ।।  287 ।।

लङ्का मे सञ्चित घृत तेल । हमरा बालधि अर्प्पित भेल ।।  288 ।।

सा ओ वसन लपेटल पूछ । मन जरि जायत वानर तूछ ।।  289 ।।

प्रभु-प्रताप नहि मानल हारि । सगर नगर घर हम देल जारि ।।  290 ।।



सोरठा



कर्म्म करत के आन, सुरदुर्ल्लभ हनुमान सन ।।  291 ।।

हित के अहँक समान, सजल-नयन रघुनाथ कह ।।  292 ।।

अतिसाहसधर वीर, अविरल भक्तिक भवन अहँ ।।  293 ।।

पिता अहाँक समीर, जगत्प्राण-सुत उचित थिक ।।  294 ।।



धनाक्षरी



नाव अरि लाब नहि उतरक दाब नहि, ।।  295 ।।

एक बुद्धि आब नहि सागर अपार में ।।  296 ।।

वीर अरि छोट नहि सङ्ग एक गोट नहि, ।।  297 ।।

लङ्का लघु कोट नहि विदित संसार में ।।  298 ।।

दनुज अबल नहि, पुरी गम्य थल नहि, ।।  299 ।।

प्रदेश अम्मल नहि युद्धक विचार मे ।।  300 ।।

अहाँक समान महि वीर हनुमान नहि, ।।  301।।

सर्व्वस्वक दान नहि तूल उपाकर मे ।।  302 ।।



इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिलाभाषा-रामायणे सुन्दरकाण्डे चतुर्थोध्यायस्समाप्तः सुन्दरकाण्ड समाप्त

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